Jan 9, 2026
असम-मध्यप्रदेश: जंगलों में नई उमंग, भैंसें-गैंडे की वापसी और रेशम की चमक
मध्यप्रदेश और असम के बीच वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मुलाकात में जैव विविधता बढ़ाने के लिए दुर्लभ प्रजातियों के आदान-प्रदान पर सहमति बनी, जो प्रदेश के जंगलों को और समृद्ध बनाएगी। साथ ही, असम की पारंपरिक रेशम कला से प्रेरणा लेकर हथकरघा क्षेत्र को नई ताकत मिलेगी।
वन्यजीव आदान-प्रदान: संरक्षण की नई मिसाल
अगले तीन वर्षों में असम से मध्यप्रदेश को तीन चरणों में 50 जंगली भैंसें, एक जोड़ा एकसींग वाला गैंडा और तीन किंग कोबरा लाए जाएंगे। ये जीव शुरू में भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में रखे जाएंगे। बदले में, मध्यप्रदेश असम को रॉयल बंगाल टाइगर का एक जोड़ा और छह मगरमच्छ प्रदान करेगा।
यह कदम इसलिए खास है क्योंकि मध्यप्रदेश में जंगली भैंसों की प्रजाति एक सदी से ज्यादा पहले विलुप्त हो चुकी थी। चीता पुनर्स्थापना की सफलता के बाद अब भैंसों की वापसी से प्रदेश की पारिस्थितिकी मजबूत होगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि कान्हा टाइगर रिजर्व इन भैंसों के लिए सबसे आदर्श जगह है, जहां घास के मैदान, पानी के स्रोत और कम मानवीय दखल उपलब्ध हैं। केंद्र से जरूरी मंजूरियां लेने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है।
सुआलकुची की रेशम यात्रा: सांस्कृतिक प्रेरणा
असम दौरे पर मुख्यमंत्री ने गुवाहाटी के पास विश्व प्रसिद्ध 'सिल्क विलेज' सुआलकुची का दौरा किया। यहां उन्होंने मूगा, पैट और एरी रेशम की पारंपरिक बुनाई को नजदीक से देखा। बुनकरों के घरों और कार्यशालाओं में मेहकला-चादर, साड़ियां व अन्य वस्त्रों की निर्माण प्रक्रिया ने सबको प्रभावित किया।
इस गांव की हथकरघा विरासत न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार भी। मुख्यमंत्री ने कहा कि असम की इस कला से सीख लेकर मध्यप्रदेश के हथकरघा और शिल्प क्षेत्र को नई दिशा मिलेगी।
यह समझौता और दौरा दोनों राज्यों के बीच सहयोग की नई शुरुआत है, जो संरक्षण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा।








