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भोपाल की नन्ही परी की चीखें: तीन बार फांसी की सजा पर हाईकोर्ट ने लगाई अंतिम मुहर

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Jan 23, 2026

भोपाल की नन्ही परी की चीखें: तीन बार फांसी की सजा पर हाईकोर्ट ने लगाई अंतिम मुहर

 भोपाल की एक पांच साल की मासूम बच्ची की निर्दोष आँखों में बस सपने थे, लेकिन एक दरिंदे ने उन सपनों को हमेशा के लिए कुचल दिया। अपहरण, क्रूर बलात्कार, चाकू से प्राइवेट पार्ट में हमला और फिर गला घोंटकर हत्या—यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि वह नन्ही सी थी और अकेली। आरोपी अतुल निहाले ने शव को प्लास्टिक की टंकी में छिपाया, लेकिन सच छिप नहीं सका। विशेष कोर्ट ने तिहरा मृत्युदंड सुनाया, और अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे बरकरार रखते हुए कहा—ऐसा घिनौना, बर्बर अपराध माफी का हकदार नहीं। यह फैसला सिर्फ सजा नहीं, बल्कि हर माँ-बहन की सुरक्षा का मजबूत संदेश है।

 नन्ही सी उम्र में छीनी गई मासूमियत

24 सितंबर 2024 को शाहजहानाबाद इलाके में खेलती-कूदती पांच साल की बच्ची दादी के कहने पर किताब लाने गई, लेकिन घर नहीं लौटी। परिवार की तलाश और पुलिस की छानबीन में दो दिन बाद उसी मल्टी के एक फ्लैट से बदबू आई। बाथरूम में रखी प्लास्टिक टंकी खोली तो अंदर नन्ही बच्ची का शव मिला—कपड़ों और जूतों से ढका हुआ। मेडिकल रिपोर्ट ने खौफनाक सच उजागर किया: बलात्कार के दौरान चाकू से प्राइवेट पार्ट में गहरी चोटें, शरीर पर 10 जगहों पर जख्म, मुंह दबाकर हत्या। आरोपी अतुल निहाले (30) पड़ोसी ही था, जो मजदूरी करता था और परिवार के साथ बच्ची की तलाश में भी शामिल हुआ था—शायद सबूत मिटाने के लिए।

कोर्ट की सख्त आवाज: मौत से भी बड़ी सजा होनी चाहिए

भोपाल की विशेष पॉक्सो अदालत ने 10 मार्च 2025 को अतुल को अपहरण, बलात्कार और हत्या के लिए अलग-अलग तीन बार फांसी (तिहरा मृत्युदंड) सुनाई। जज कुमुदिनी पटेल ने कहा—यह 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मामला है, आरोपी इतना क्रूर और हैवानियत भरा कि मौत की सजा भी कम पड़ती है। उसकी मां बसंती और बहन चंचल को सबूत छिपाने के लिए 2-2 साल की सजा मिली। अतुल को अन्य धाराओं में दोहरी उम्रकैद भी हुई। यह नए भारतीय न्याय संहिता के तहत मध्य प्रदेश का पहला तिहरा मृत्युदंड केस था।

 हाईकोर्ट ने कहा—कोई रियायत नहीं, अपराध बर्बरता की हद पार

आरोपी के परिवार ने अपील की, लेकिन जबलपुर हाईकोर्ट की पीठ (जस्टिस विवेक अग्रवाल और राजकुमार चौबे) ने अपील ठुकरा दी। कोर्ट ने साफ कहा—मेडिकल सबूत साबित करते हैं कि बच्ची के साथ अत्यधिक क्रूरता हुई, प्राइवेट पार्ट में चाकू घोंपा गया, यह निर्मम और घिनौना कृत्य है। ऐसे अपराध में माफी या रियायत का कोई स्थान नहीं। फैसला बरकरार रखते हुए कोर्ट ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी में रखा और न्याय की मजबूती दिखाई।

 हर बच्ची की सुरक्षा का वादा

यह सिर्फ एक केस का फैसला नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। मासूम बच्चियों की मासूमियत पर हमला करने वालों को कानून अब और सख्ती से कुचलेगा। परिवारों को सतर्क रहना होगा, समाज को जागरूक होना होगा। यह नन्ही परी की चीखें हैं जो अब न्याय की आवाज बन गई हैं—ताकि कोई और माँ अपनी बेटी को खोने की कसक न झेले। न्याय हुआ है, लेकिन दर्द हमेशा रहेगा। उम्मीद है, ऐसे फैसले अपराधियों के मन में खौफ पैदा करेंगे और हर बच्ची सुरक्षित मुस्कुरा सकेगी।

 

Report By:
Monika